मील के पत्थरो का हिसाब नही देखा,
उनके सवालो का जबाव नही देखा |सब नापते है मेरी मंज़िल की उँचाइयो को,
उन्होने मेरे सफ़र का आगाज़ नही देखा |हर अजनबी को गले लगाकर दुआ देना,
तुम्हारे शहर म हमने ये रिवाज़ नही देखा|है लकीरे खींचता जो मुसव्विर रात दिन ,
उसे अदा करते नमाज़ नही देखा | स्वप्निल यादव
तुम कहती तो थी हमेशा दरवाजे पे टोककर कि सर्दी बहुत है स्वेटर पहन लो बाहर जाते वक़्त, तुम्हारे जाने के बाद कोई टोकता ही नही स्वेटर के लिए माँ इस साल बहुत सर्दी है
बच्चे तितली का पंख हो जाएँ
या मेरी तरह बेरंग हो जाएँ ,
मंज़िल सबकी बेशक अलग हों
मगर रास्ते मे हम संग हो जाएँ.
रात मे घर से निकला
तो चाँद बोला कि मै भी साथ चलुगा
पूरे सफ़र वो साथ ही चलता रहा
रात भर तक तो साथ ही था
सुबह सुबह पता नही कहा चला गया
शायद ................. किसी और के साथ
सफ़र का साथ देने
सबका चाँद एक ही तो है
यार कही वो तुम्हारे साथ तों नही
झूठ है कि सच मुझे मालूम नही
तू है क्या मुझे मालूम नही
मै मै हू बस इतना पता है...
मै अपने घर मे ही ठीक हू
खिड़कियो से बाहर झाकना मेरी आदत नही