Saturday, July 16, 2011

ग़ज़ल...


मील के पत्थरो का हिसाब नही देखा,
उनके सवालो का जबाव नही देखा |
सब नापते है मेरी मंज़िल की उँचाइयो को,
उन्होने मेरे सफ़र का आगाज़ नही देखा |
अजनबी को गले लगाकर दुआ देना,
तुम्हारे शहर हमने ये रिवाज़ नही देखा|
है लकीरे खींचता जो मुसव्विर रात दिन ,
उसे अदा करते नमाज़ नही देखा | स्वप्निल यादव

Saturday, November 20, 2010

माँ


तुम कहती तो थी हमेशा दरवाजे पे टोककर कि सर्दी बहुत है स्वेटर पहन लो बाहर जाते वक़्त, तुम्हारे जाने के बाद कोई टोकता ही नही स्वेटर के लिए माँ इस साल बहुत सर्दी है

Saturday, November 6, 2010

मगर मै


यह दुनिया तुम्हे जी भरकर चाहेगी
मगर मै तुम्हारा ख़याल रखुगा
यह दुनिया तुम्हे जमकर हसाएगी
मगर मै तुम्हारे आसू पोच्ुगा
यह दुनिया तुम्हारा हाथ थामेगी
मगर मै तुम्हे गिरने पर संभालुगा
यह दुनिया तुम्हे सुनेगी
मगर मै तुम्हारी खामोशी समझुगा
यह दुनिया तुम्हारी पूजा करेगी
मगर मै तुम पर विश्वास करूगा

ग़ज़ल

यह जानता हू कि समंदर नही हू मै
मगर दरिया कि तरह अकेला नही हू मै

जिस राह पर सबने यहा पाई मंज़िल
मुझे जुनून कि उस पर चलता नही हू मै

हवा ज़िद पर कायम मुजे उड़ाने के लिए
उसे बता दो कोई कतरा नही हू मै

मागता है वो मंदिर मे भगवान से मुझे
मोहब्बत मे आसानी से मिलता नही हू मै







यह
जानता हू कि समंदर नही हू मै मगर दरिया कि तरह अकेला नही हू मै
जिस राह पर सबने यहा पाई मंज़िल मुझे जुनून कि उस पर चलता नही हू मै हवा ज़िद पर कायम मुझे उड़ाने के लिए उसे बता दो कोई कतरा नही हू मै
मागता
है वो मंदिर मे भगवान से मुझे मोहब्बत मे आसानी से मिलता नही हू मै

Wednesday, October 13, 2010

तितली


बच्चे तितली का पंख हो जाएँ
या
मेरी तरह बेरंग हो जाएँ ,
मंज़िल
सबकी बेशक अलग हों
मगर रास्ते मे हम संग हो जाएँ.

Tuesday, October 12, 2010

सफ़र......


रात मे घर से निकला
तो
चाँद बोला कि मै भी साथ चलुगा
पूरे
सफ़र वो साथ ही चलता रहा
रात
भर तक तो साथ ही था
सुबह
सुबह पता नही कहा चला गया
शायद ................. किसी और के साथ
सफ़र
का साथ देने
सबका
चाँद एक ही तो है
यार
कही वो तुम्हारे साथ तों नही

Monday, October 11, 2010

आदत


झूठ है कि सच मुझे मालूम नही
तू है क्या मुझे मालूम नही
मै
मै हू बस इतना पता है...
मै
अपने घर मे ही ठीक हू
खिड़कियो
से बाहर झाकना मेरी आदत नही