Saturday, November 6, 2010

ग़ज़ल

यह जानता हू कि समंदर नही हू मै
मगर दरिया कि तरह अकेला नही हू मै

जिस राह पर सबने यहा पाई मंज़िल
मुझे जुनून कि उस पर चलता नही हू मै

हवा ज़िद पर कायम मुजे उड़ाने के लिए
उसे बता दो कोई कतरा नही हू मै

मागता है वो मंदिर मे भगवान से मुझे
मोहब्बत मे आसानी से मिलता नही हू मै







यह
जानता हू कि समंदर नही हू मै मगर दरिया कि तरह अकेला नही हू मै
जिस राह पर सबने यहा पाई मंज़िल मुझे जुनून कि उस पर चलता नही हू मै हवा ज़िद पर कायम मुझे उड़ाने के लिए उसे बता दो कोई कतरा नही हू मै
मागता
है वो मंदिर मे भगवान से मुझे मोहब्बत मे आसानी से मिलता नही हू मै

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