Wednesday, October 13, 2010

तितली


बच्चे तितली का पंख हो जाएँ
या
मेरी तरह बेरंग हो जाएँ ,
मंज़िल
सबकी बेशक अलग हों
मगर रास्ते मे हम संग हो जाएँ.

Tuesday, October 12, 2010

सफ़र......


रात मे घर से निकला
तो
चाँद बोला कि मै भी साथ चलुगा
पूरे
सफ़र वो साथ ही चलता रहा
रात
भर तक तो साथ ही था
सुबह
सुबह पता नही कहा चला गया
शायद ................. किसी और के साथ
सफ़र
का साथ देने
सबका
चाँद एक ही तो है
यार
कही वो तुम्हारे साथ तों नही

Monday, October 11, 2010

आदत


झूठ है कि सच मुझे मालूम नही
तू है क्या मुझे मालूम नही
मै
मै हू बस इतना पता है...
मै
अपने घर मे ही ठीक हू
खिड़कियो
से बाहर झाकना मेरी आदत नही

बचपन


आज खोली है पुरानी अलमारी
इसमे से निकाली है पुरानी किताबे
इन पर से हटानी है धूल
जी तो चाहता है की इनमे आग लगा दू......
इन किताबो ने छीना है मेरा बचपन
मेरे खेलने के वक़्त को इन्होने हमेशा कम किया है
लेकिन इन्हे निकाला गया है अगली पीढ़ी के लिए
वो भी पढ़ेगे इन्हे
हटाएगे धूल..............
और फिर मेरी तरह
अपना बचपन खो देगे........

Sunday, October 10, 2010

चौराहा.........


ना वो हम है
ना वो तुम हो
ना कसमे
ना वादे
हम चौराहे पर चुके है
इतने लंबे सफ़र में
वो कसमे
वो वादे
वहीं गलियों मे ही छूट गये
और लोग आएगे
वो भी उठाएगे
उन कसमो को
उन वादों को
लेकिन जब उन्हे आना होगा चौराहे पर
वो फिर उन्हे गलियों मे ही छोड़ आएगे.